व्यक्तित्व
'अभिव्यक्ति लेख': मानसून की बेरुखी और बढ़ता ग्रामीण संकट
झझारखंड उत्कर्ष संवाददाता •


भारत की अर्थव्यवस्था की असली धड़कन आज भी उसके गांवों और खेतों में बसती है। यही कारण है कि मानसून की चाल केवल मौसम का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका, देश की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का भी निर्धारण करती है। समय पर और पर्याप्त वर्षा खेतों में हरियाली के साथ ग्रामीण बाजारों में रौनक लाती है, जबकि कमजोर या असमान मानसून खेती, रोजगार और आम लोगों की रसोई तक को प्रभावित करता है। वर्ष 2026 में देश के अनेक हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारतीय कृषि अब भी मानसून की दया पर निर्भर है। जून में बारिश की भारी कमी और जुलाई के अंत तक औसत से लगभग 15 प्रतिशत कम वर्षा के कारण बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में धान, सोयाबीन सहित खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा छोटे और सीमांत किसानों को भुगतना पड़ रहा है, जिनके पास सीमित संसाधन हैं और जिनके लिए हर असफल फसल कर्ज, आर्थिक संकट और भविष्य की अनिश्चितता का कारण बन जाती है। खेती की रफ्तार धीमी पड़ने का सीधा असर खेतिहर मजदूरों के रोजगार पर भी पड़ता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी और पलायन बढ़ने लगता है। दूसरी ओर, कृषि उत्पादन घटने की आशंका दाल, चावल, खाद्य तेल और सब्जियों जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ाती है, जिसका सबसे अधिक बोझ गरीब और निम्न आय वर्ग उठाता है। चिंता की बात यह है कि जलवायु परिवर्तन ने मानसून की अनिश्चितता को और गहरा कर दिया है। अब कहीं कुछ घंटों में मूसलाधार बारिश से बाढ़ की स्थिति बन जाती है, तो कहीं लंबे समय तक वर्षा न होने से सूखे जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। वर्षा का यह असंतुलित स्वरूप न तो भूजल का पर्याप्त पुनर्भरण होने देता है और न ही फसलों को आवश्यक नमी मिल पाती है। ऐसे में केवल अच्छी बारिश की उम्मीद करना दूरदर्शी नीति नहीं हो सकती। समय की मांग है कि वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, फसल विविधीकरण तथा कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने जैसे उपायों को व्यापक स्तर पर लागू किया जाए। इसके साथ ही जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों का विस्तार, मौसम आधारित कृषि परामर्श, प्रभावी फसल बीमा, किसान उत्पादक संगठनों को सशक्त बनाने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि आधारित उद्योगों और वैकल्पिक रोजगार के अवसर विकसित करने पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। स्पष्ट है कि मानसून की अनिश्चितता अब केवल प्राकृतिक चुनौती नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक नीति की भी बड़ी परीक्षा बन चुकी है। यदि कृषि को मानसून पर अत्यधिक निर्भरता से मुक्त कर वैज्ञानिक, आधुनिक और टिकाऊ बनाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ग्रामीण संकट और खाद्य असुरक्षा दोनों गहराते जाएंगे। भारत की समृद्धि का आधार उसके खेत हैं और खेतों की सुरक्षा ही देश के भविष्य की सुरक्षा है।
मिथलेश दास
प्रबंध निदेशक
इंटेलिजेंशिया टीचर एजुकेटर्स फाउंडेशन, धनबाद
मिथलेश दास
प्रबंध निदेशक
इंटेलिजेंशिया टीचर एजुकेटर्स फाउंडेशन, धनबाद